- गौर में 512 वर्षों की अटूट आस्था: संपन्न हुआ ऐतिहासिक ‘रामकेली मेला’, उमड़ा देश-विदेश के श्रद्धालुओं का जनसैलाब
- भक्ति, सहिष्णुता और सामाजिक क्रांति का 512 वर्ष पुराना प्रतीक: रामकेली मेला
- इतिहास, आस्था और समरसता का संगम: चैतन्य महाप्रभु के वैचारिक आंदोलन की जीवंत मिसाल है ‘रामकेली’
Ramkeli Mela: भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का ऐतिहासिक गाँव गौर (रामकेली) पिछले सप्ताह एक बार फिर इतिहास और भक्ति के अनूठे रंग में सराबोर नजर आया। आज से ठीक 512 वर्ष पूर्व, प्रेमावतार श्री चैतन्य महाप्रभु ने वैष्णव धर्म और प्रेम का संदेश फैलाने के लिए इस पवित्र भूमि पर अपने कदम रखे थे।
महाप्रभु की इसी दिव्य स्मृति को जीवंत रखते हुए यहाँ हर वर्ष ऐतिहासिक ‘रामकेली मेले’ का आयोजन किया जाता है। ज्येष्ठ संक्रांति के पावन अवसर पर शुरू होने वाला यह पारंपरिक मेला पिछले सप्ताह पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस दौरान मालदा के स्थानीय निवासियों के अलावा, देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं, साधु-संतों और तीर्थयात्रियों का जनसैलाब उमड़ पड़ा।
‘जीवे दया, नामे रुचि’: महाप्रभु का क्रांतिकारी प्राकट्य
वैष्णव आंदोलन का यह दौर बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण था। नादिया जिले में जन्मे श्री चैतन्य महाप्रभु ने तत्कालीन समाज की रूढ़िवादिता की बेड़ियों को तोड़ते हुए एक अत्यंत सरल और क्रांतिकारी उपदेश दिया। “जीवे दया, नामे रुचि” अर्थात—सभी जीवों पर दया करो और हरिनाम से सच्चा प्रेम करो। उनके इस समावेशी मार्ग ने समाज के वंचित और शोषित वर्ग को आत्मसम्मान और गरिमा दिलाई। परिणामस्वरूप, जो लोग तत्कालीन विसंगतियों से निराश थे, वे बड़ी संख्या में पुनः सनातन धर्म की ओर आकर्षित हुए।
रामकेली प्रवास: जब सत्ता और वैभव तिनके के समान छूट गए
अपनी वृंदावन यात्रा के दौरान महाप्रभु हरिनाम संकीर्तन करते हुए मालदा के गौर क्षेत्र पहुँचे। यहाँ उन्होंने धर्म, जाति और वर्ग की सीमाओं को मिटाकर सबको एक सूत्र में पिरोया। मंत्रियों का हृदय परिवर्तन: सुल्तान हुसैन शाह के दरबार के दो अत्यंत शक्तिशाली, विद्वान और उच्च पदस्थ मंत्री—दबीर खास और साकर मलिक—महाप्रभु के दिव्य प्रेम से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने राजसी सुखों को तिनके के समान त्याग दिया। महाप्रभु से दीक्षा ग्रहण करने के बाद, यही दो मंत्री आगे चलकर वैष्णव समाज के महान मार्गदर्शक ‘रूप गोस्वामी’और ‘सनातन गोस्वामी’ के रूप में अमर हुए। इतिहास का पहला सामूहिक विवाह: सामाजिक समरसता की मिसाल
रामकेली केवल भजनों और संकीर्तन की भूमि नहीं है, बल्कि यह एक महान सामाजिक क्रांति की भी गवाह है। समाज से जातिवाद और छुआछूत को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए महाप्रभु की प्रेरणा से इसी मेला परिसर में इतिहास का पहला ‘हिंदू सामूहिक विवाह’ आयोजित किया गया था। ऊंच-नीच के भेदभाव को भुलाकर विभिन्न वर्गों के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित करना, उस युग की कट्टरता के खिलाफ महाप्रभु का एक मौन लेकिन बेहद सशक्त वैचारिक प्रहार था।
आज भी गूंजती है महाप्रभु के पैरों की धूल
सफलतापूर्वक अपने 512वें वर्ष के पड़ाव को पार कर चुका यह ऐतिहासिक रामकेली मेला केवल मनोरंजन या व्यापार का साधन नहीं है। यह भारत की उस गौरवशाली विरासत का जीवंत प्रतीक है, जिसने कठिन से कठिन समय में भी अपनी संस्कृति, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों को अक्षुण्ण रखा। इस वर्ष भी रामकेली की पवित्र मिट्टी में महाप्रभु के चरणों की धूल और हरिनाम की वह दिव्य गूंज साफ महसूस की गई, जो सदियों बाद आज भी लाखों दिलों को आपस में जोड़ रही है।

लेखिका: डॉ. झिलिक सोम
